सक्ती जिले की 4 थीं वर्षगांठ पर विशेष..

सक्ती के चार साल – जश्न भी, सवाल भी
संजय शर्मा
सक्ती जिला अब चार साल का हो गया है। अपने पैरों पर खड़ा होने की कोशिश करता यह नन्हा जिला आज शैशव अवस्था से बाहर निकल रहा है। इसलिए यह क्षण जिले के हर वाशिंदे के लिए खुशी का है, जश्न का है। लोग अपने-अपने तरीके से इस खुशी का इजहार कर रहे हैं। राजनीतिक दलों के मुखिया भी बधाई और शुभकामनाएं दे रहे हैं, यह अच्छी बात है। जिले के विकास के लिए सबका मन, मस्तिष्क और दलगत राजनीति से ऊपर उठकर एक साथ आना ही सबसे बड़ा संकेत है। पर भैया, जश्न के साथ-साथ आत्म-मंथन भी जरूरी है।
चार साल में क्या पाया, क्या खोया?
राजनीतिक विरासत के मामले में सक्ती हमेशा धनी रहा है। राजपरिवार के दौर से लेकर स्व. भवानी लाल वर्मा , स्व. वेदराम जी, नावेल वर्मा, मेघराम साहू और अब डॉ. चरणदास महंत तक , सक्ती ने हमेशा बड़े नेता दिए हैं।
- लेकिन प्रशासनिक और जमीनी तस्वीर क्या कहती है?
सच कहें तो चार साल बाद भी सक्ती को जिले का असली स्वरूप नहीं मिल पाया है। आज भी आधे से ज्यादा विभाग उधारी पर चल रहे हैं। जनता की मूलभूत जरूरत – शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, बिजली, सड़क की हालत आज भी तहसील जैसी ही है।
और सबसे बड़ा सवाल – डोलोमाइट हब में लूट?
सक्ती को डोलोमाइट हब कहा जाता है। भगवान ने इस धरती को खनिज का अकूत भंडार दिया है, पर इन चार सालों में इस खजाने की रखवाली कौन कर रहा है? जिले में खनिज माफिया बेलगाम है। रातों-रात डोलोमाइट और मुरुम-गिट्टी से भरे सैकड़ों हाइवा बिना रॉयल्टी के निकल रहे हैं। प्रशासन को सब दिखता है, पर अंकुश नहीं लगता। दूसरी तरफ जिला बनते ही जमीन के दलाल सक्रिय हो गए हैं। सरकारी जमीनों पर कब्जे का खेल चल रहा है। बिना ले-आउट, बिना डायवर्सन के अवैध कॉलोनियां काटी जा रही हैं। किसान की जमीन को टुकड़ों में बेचकर, गरीबों को फंसाया जा रहा है। इस पर लगाम लगाना नए जिले की सबसे बड़ी चुनौती है।
हाँ, दो जगह तस्वीर अच्छी है – गृह निर्माण मंडल का संभागीय कार्यालय सक्ती को मिलना और प्रधानमंत्री आवास योजना में जिले का अच्छा प्रदर्शन।
आगे की राह
अब ट्रिपल इंजन की भाजपा सरकार है, सांसद कमलेश जांगड़े हैं और विपक्ष में डॉ. महंत जैसा अनुभवी नेता है। अगर ये सब मिलकर खनिज माफिया, जमीन दलाल और अवैध कॉलोनाइजर पर नकेल कसें, तो ही सक्ती का असली विकास होगा। नहीं तो जश्न तो हर साल होगा, पर जिला वहीं का वहीं रह जाएगा।
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