राजनीति में भरोसे का संकट: अपने ही सबसे बड़े खतरा राजनीति को सेवा का माध्यम कहा जाता है। लेकिन आज के दौर में यह क्षेत्र सबसे ज्यादा चुनौती भरा हो गया है। और सबसे बड़ी चुनौती है – अपने और पराये की पहचान।पहले राजनीति में विचारधारा, सिद्धांत और निष्ठा की बात होती थी। कार्यकर्ता दशकों तक एक झंडे के नीचे काम करते थे। हार-जीत से ऊपर पार्टी और नेता का साथ निभाते थे। लेकिन मौजूदा परिवेश में यह तस्वीर बदल गई है। भरोसे की कड़ी कमजोर क्यों हुई?आज टिकट , पद और पावर के लिए निष्ठा की कीमत लगने लगी है। कल तक मंच पर साथ खड़े होकर नारे लगाने वाला, आज दूसरी पार्टी के मंच से विरोध करता दिख जाता है। वरिष्ठ नेता शरद पवार, ममता बनर्जी जैसे उदाहरण हमारे सामने हैं। जिन्हें अपनी ही बनाई पार्टी को बचाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। सबूत जुटाने पड़े। अपनों से ही अपनी पार्टी बचानी पड़ी। जब शीर्ष स्तर पर यह हाल है तो जमीनी स्तर पर क्या होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। राजनीति में “घात करके वार” करना कोई नई बात नहीं है। लेकिन अब इसका तरीका बदल गया है।सामने “जय हो” और पीठ पीछे “साजिश हो”। सार्वजनिक मंच पर तारीफ और बंद कमरे में विरोध।व्हाट्सएप ग्रुप में एक बात और जनता के बीच दूसरी बात।इस दोहरे चरित्र ने कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ा है। मेहनती कार्यकर्ता सोचता है – “मैं दिन-रात मेहनत करूं और कल कोई मेरा नाम ही काट दे तो?”दुख की बात यह है कि अब यह बीमारी पंचायत और स्थानीय निकाय तक पहुंच गई है। जहां राजनीति की पाठशाला मानी जाती है , वहां भी अब व्यक्तिगत सम्मान और सार्वजनिक सम्मान के मापदंड अलग-अलग हो गए हैं। सामने “भैया” और पीठ पीछे “साजिश”। इसका सीधा असर जनता के भरोसे पर पड़ रहा है। लोग कहने लगे हैं – “सब एक जैसे हैं”। इस संकट से निकलने का एक ही रास्ता है – संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करना। टिकट और पद वितरण में निष्ठा को प्राथमिकता।जो जमीन पर काम कर रहा है उसे सार्वजनिक मंच पर सम्मान गद्दारी और दोहरे चरित्र पर जीरो टॉलरेंसनेता और कार्यकर्ता का रिश्ता परिवार जैसा होना चाहिए। परिवार में धोखा नहीं होता। जब तक हम अपनों पर भरोसा नहीं कर पाएंगे, तब तक जनता हम पर भरोसा नहीं करेगी। और जब तक जनता का भरोसा नहीं जीतेंगे, सत्ता का रास्ता मुश्किल है। राजनीति विचारधारा से चलती है, सौदेबाजी से नहीं। निष्ठा से चलती है, अवसरवादिता से नहीं।


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