23 जुलाई – पुण्यतिथि विशेष

आज अविभाजित मध्यप्रदेश की राजनीति का वो अध्याय याद आता है जिसे लोग तीन शब्दों में याद करते थे – सादगी, सिद्धांत और सेवा। आज उसी शख्सियत की पुण्यतिथि है – स्व. बिसाहू दास महंत
सारागांव से बाराद्वार तक का सफर
बाराद्वार से करीब 5 किलोमीटर दूर सारागांव – यही उनकी जन्मभूमि है , व इसी मिट्टी ने एक ऐसा बेटा दिया जिसने राजनीति को सेवा का पर्याय बना दिया।
जब बाराद्वार क्षेत्र पहली बार विधानसभा बना, तो जनता ने जिस चेहरे पर भरोसा किया वो थे बिसाहू दास महंत। वे सिर्फ पहले विधायक नहीं थे, वे उस पूरे क्षेत्र की आवाज थे। खादी की धोती, सादगी भरा जीवन और “सबको साथ लेकर चलो” वाला स्वभाव।
इसीलिए पूरे प्रदेश में उन्हें अजात शत्रु कहा जाता था। राजनीति में रहकर भी जिसका कोई दुश्मन न हो।
मंत्री थे, पर मन से सेवक
अविभाजित मध्यप्रदेश में मंत्री रहते हुए उन्होंने छत्तीसगढ़ के विकास में अहम योगदान दिया।
पर कुर्सी का घमंड उन्हें कभी नहीं हुआ।
बुजुर्ग आज भी एक संस्मरण सुनाते हैं –
ग्वालियर की राजमाता विजयाराजे सिंधिया जब क्षेत्र के प्रवास पर आईं, तब बिसाहू दास जी मंत्री थे। उन्होंने अपने लिए आरक्षित रेस्ट हाउस राजमाता के लिए खाली कर दिया। यहीं नहीं रुके, अपने गृह ग्राम सारागांव में राजमाता के स्वागत के लिए खुद भीड़ जुटाई और सभा करवाई।
पद का मान नहीं, अतिथि का मान बड़ा। यही उनकी उदारता और नैतिकता थी जो आज भी उदाहरण है।
विरासत जो आज भी जिंदा है
समय बदला, प्रदेश बंटे, पर संस्कार नहीं बदले।
आज उनके चिरंजीव डॉ. चरणदास महंत छत्तीसगढ़ विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं। पिता की सादगी, जनता से जुड़ाव और “विरोध भी, पर वैमनस्य नहीं” वाला पाठ उन्हें विरासत में मिला।
आज के लिए सीख
बिसाहू दास महंत हमें याद दिलाते हैं कि राजनीति की सबसे बड़ी ताकत हथियार नहीं, भरोसा है। सत्ता आएगी-जाएगी, पर “अजात शत्रु” बनकर लोगों के दिलों में जगह बनाना ही असली जीत है।
“उनका जीवन संघर्ष, समर्पण और जनसेवा का प्रतीक है, जो आज भी प्रेरणास्रोत है”
💐 शत्-शत् नमन 💐
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