बाराद्वार: संगठन बनाम सत्ता

बाराद्वार की राजनीति में इन दिनों एक पत्र चर्चा का विषय बना हुआ है। भाजपा मंडल अध्यक्ष गेंदराम मनहर ने अपनी ही पार्टी की नगर पंचायत सरकार के मुखिया नारायण कुर्रे और भाजपा पार्षदों की निधि का ब्यौरा मांगते हुए मुख्य नगर पालिका अधिकारी (CMO) को पत्र लिख दिया है।
तर्क पारदर्शिता का, सियासी अर्थ गहरे
मंडल अध्यक्ष का तर्क है कि सरकारी योजनाओं और विकास कार्यों की जानकारी कार्यकर्ताओं के पास होनी चाहिए, ताकि वे तथ्यों के साथ जनता के बीच जा सकें। इसी क्रम में उन्होंने नपं अध्यक्ष से निधि की जानकारी मांगी थी, जो नहीं मिलने पर सीएमओ को पत्र लिखना पड़ा। इसे वे सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया बता रहे हैं।
नगर सरकार का पलटवार
वहीं नगर पंचायत अध्यक्ष नारायण कुर्रे का कहना है कि उनकी एवं पार्षदों की निधि के संबंध में मंडल अध्यक्ष ने उनसे कभी चर्चा ही नहीं की। कुर्रे के इस बयान के बाद सवाल गहरा गया है कि यदि चर्चा ही नहीं हुई तो सीधे सरकारी दफ्तर में पत्राचार क्यों?
सवाल प्रक्रिया का नहीं, परिपाटी का है
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मामला जितना सामान्य बताया जा रहा है, उतना है नहीं। जनता द्वारा निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की कार्यशैली पर यदि उनकी ही पार्टी का मंडल अध्यक्ष सार्वजनिक रूप से प्रश्नचिन्ह लगाएगा, तो विपक्ष को बैठे-बिठाए संजीवनी मिल जाएगी।
भाजपा विश्व की सबसे बड़ी अनुशासित पार्टी है। इस विषय को जिला नेतृत्व के माध्यम से बंद कमरे में भी सुलझाया जा सकता था। जिस संगठन के इशारे पर सरकारें चलती हैं, यदि वही संगठन लक्ष्मण रेखा लांघकर अपनी ही चुनी हुई सरकार के खिलाफ सरकारी फाइल चलाने लगे, तो कार्यकर्ताओं और जनता के बीच क्या संदेश जाएगा?
यह पत्र महज जानकारी मांगने का पत्र नहीं, बल्कि बाराद्वार में संगठन और सत्ता के बीच बढ़ती दूरी का संकेत है। अब निगाहें जिला संगठन पर टिकी हैं।
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